ये एक नये तरह का प्रयोग है, कला को Whatspp से जोड़कर वेबसाइट पर लाया जा रहा है | WhatsApp पर ‘युवा साहित्य’ ग्रुप की दिन भर की खोज खबर, ग़ज़ल, शेरो-शायरी, कविता या फिर रोमांचक बातें आप तक पहुचाई जा रही है | हाज़िर है पिछले दिनों की हलचल हमारे ग्रुप से-
शहर बनारस के दिलशाद अहमद साहब लिखते हैं-
दिलशाद भाई ने पिछले दिनों हुए कार्यक्रम में खूब तालियाँ बटोरी थी या यूँ कहिये महफ़िल ही लूट ली थी |
शेरो शायरी का दौर हो और नंदन भाई का जिक्र ना हो ये कैसे हो सकता है, नंदन जी शिव इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर हैं और अपना हाल ए दिल कुछ यूँ बयां करते हैं-
आप समझ ही गए इन्हें कितनी गहरी लागी है ग़ज़ल से या फिर ....
अच्छा ये भी पढ़ लीजिये ....
वो कहते हैं ना उम्र ५५ की दिल बचपन का, अरे भाई ऐसा कुछ नहीं है ये तो बस ..
ओ. पी जी ने कुछ लिखा, ‘अधरों’ की बात कर रहे थे तो सोचा थोडा रसपान मैं भी कर लूँ
श्याम जी थोड़े खफा खफा से हैं, शायद भाभी जी को पसंद नहीं इसलिए इश्क़ से एलर्जी है |
माचिस वाले भाईसाहब का भी स्वागत है, किसी को बीडी, सिगरेट सुलगना है तो अमृत प्रकाश जी से मांग सकता है, 'जाने क्यू माचिस लिए चलता हूँ?' भाई साहब किसी के धान के खेत में आग मत लगा देना |
चलते चलते विमल भाई की कविता से थोड़ी ठण्ड का एहसास दिलाता हूँ,
आप भी हमसे जुड़ सकते हैं, बस WhatsApp पर मेसेज करिए 9670006261 आपका स्वागत है | चलता हूँ चाय इंतजार कर रही है, बुरा मान जाएगी |
शहर बनारस के दिलशाद अहमद साहब लिखते हैं-
कौन कहता है सिर्फ पानी है अश्क़,
समझो तो दर्द की तर्जुमानी है अश्क़,
होंठो से जो बयां ना हो सके
उसी दर्द ए दिल की रवानी है अश्क़ |
दिलशाद भाई ने पिछले दिनों हुए कार्यक्रम में खूब तालियाँ बटोरी थी या यूँ कहिये महफ़िल ही लूट ली थी |
शेरो शायरी का दौर हो और नंदन भाई का जिक्र ना हो ये कैसे हो सकता है, नंदन जी शिव इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर हैं और अपना हाल ए दिल कुछ यूँ बयां करते हैं-
लोग यूँ ही नहीं पहचान लेते हमें चौराहे पर,
इश्क़ में बर्बाद लाश की शिनाख़्त आसां होती है...
आप समझ ही गए इन्हें कितनी गहरी लागी है ग़ज़ल से या फिर ....
अच्छा ये भी पढ़ लीजिये ....
कुछ इस क़दर छाया है नशा तेरा, तेरे इश्क़ का
कि अब 'मैं' भी तू है और 'मय' भी तू...
वो कहते हैं ना उम्र ५५ की दिल बचपन का, अरे भाई ऐसा कुछ नहीं है ये तो बस ..
ओ. पी जी ने कुछ लिखा, ‘अधरों’ की बात कर रहे थे तो सोचा थोडा रसपान मैं भी कर लूँ
मेरे दिल की दुनिया में
धीरे-धीरे वे कदमो
बिना सूचना दिए हुए
अपने दोनों अधरों पर
नाम को मेरे रखे हुए
मुहब्बत करते आते हैं।
प्यार
इश्क
और मोहब्बत
सब झूठ, मतलब और जरूरत की निशानी बन गए हैं
क्योंकि.......!!!
आजकल ये दिल के बजाय दिमाग से जो होने लगे हैं।
माचिस वाले भाईसाहब का भी स्वागत है, किसी को बीडी, सिगरेट सुलगना है तो अमृत प्रकाश जी से मांग सकता है, 'जाने क्यू माचिस लिए चलता हूँ?' भाई साहब किसी के धान के खेत में आग मत लगा देना |
चलते चलते विमल भाई की कविता से थोड़ी ठण्ड का एहसास दिलाता हूँ,
" सर्दियों में भी कपड़े बचा कर रखता था,
जाने क्यों आँसुओं को छिपा कर रखता था।
साँसे बोझिल हों या दिल हो भरा,
बातें अपनी मुस्कुरा कर रखता था।
रसोई की पतीली की भनक उसको लगी,
थाली में कुछ रोटियाँ बचा कर रखता था।
घर पहुँचते, बिटिया दौड़ कर लिपट जायेगी,
वह उसके सपने सजा कर रखता था।
हकीकतों से रूबरू होकर, बेटा ठहर न जाये,
वह अपना बटुआ छुपा कर रखता था..!! "


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