तीन शब्द , हाँ मात्र तीन शब्दों का एक सवाल जो शायद हजारों सच्चे सवालों को भी जन्म दे रहा है , पूछा गया है जो हमें आइना दिखाने को , हमारी सच्चाई बताने को काफी है । जी हाँ , जब आप सुनेंगे लॉ स्टूडेंट पूजा दास की पहली किन्तु बहुत ही प्रभावी हिंदी कविता "मेरी रूह" को तो आप को भी वो तीन शब्दों वाला प्रश्न झकझोर कर रख देगा।
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| पूजा दास कविता पाठ के समय |
"पता
है कौन हूँ मैं?
हाँ!
वही रूह हूँ मैं
जिसकी
रूह मे उन लड़कियों की रूह बसती है जिसे आपने कभी "रेप विक्टिम" करार
दिया...
मैं
वही रूह हूँ जिसे कुछ हवस के दरिंदो ने ज़ार ज़ार कर दिया
,
कभी
आँखों से कभी बातों से ,कपड़ों के चिथड़े तो खैर बाद की बात
है...."
प्रश्न
है - आखिर कब तक ?
आखिर
कब तक यूँ ही बच्चीयों ,लड़कियों , महिलाओं की आबरू लुटती
रहेगी , कब
तक कुत्सित सोच वाले पुरुषों की नजरें , नारियों की वेदना का
पर्याय बनती रहेंगी ?
आखिर
कब तक ? कब
तक निर्भया और जैनब जैसी बच्चियाँ हैवानों की हैवानियत का शिकार होती रहेंगीं
..... आखिर कब तक ?
सीधे
- सीधे शब्दों में कहूँ तो लेखिका यानि की मिस पूजा दास ने हिंदी की अपनी पहली
कविता में ही विराट कोहली जैसी विस्फोटक पारी खेली और साथ में ये भी साबित कर दिया
की उनमें उत्तम प्रतिभा छिपी हुई है , साथ ही साथ मैं पूजा को इस
बात की भी बधाई देना चाहूँगा की उन्होंने इस कविता को लिखते समय जो प्रतिबद्धतायें
तय की थी वो लगभग पूरी होती दिख रही है।
मैं
ईश्वर से आपके सफल एवम् श्रेष्ठ साहित्यिक जीवन की कामना करता हूँ।
चलते
चलते कुछ पंक्तिया प्रिया दास की "मेरी रूह" से
मैं
उन सभी लड़कियों की रूह हूं जिनको शाम कभी सुहानी नही लगी बल्कि
दर्द का, बदनामी का एक साया लगा..
मैं
वही रूह हूं जिसके जिस्म का वो एक हिस्सा,ख़ौफ़ का सबब बन गयी..
सुमित
सोनी के साथ युवा साहित्यकारों के साथ बातों का सफ़र जारी रहेगा |

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