मुलाक़ात एक छोटी सी कहानी
"क्या से क्या हो गया!"
भाग 1 और भाग 2 में आपने प्रथम का एक तरफा प्यार और अन्तिमा की खुशनुमा ज़िन्दगी देखी आइये जानते है प्रथम और अन्तिमा के बीच आगे क्या हुआ....
"एक्सक्यूज मी" अंतिमा को पहली बार सुना था मैंने।
मैंने मुस्करा कर जवाब दिया ' जी, कहिए!' वो कौन बेवकूफ होगा जो हिन्दी में इतनी खूबसूरत लड़की के सामने जवाब देगा? बनारस के रिक्शे वाले भी टूटी फूटी अंग्रेजी मे बात कर लेते हैं और मै कमबख्त!
उसने संकेतों से 'जाने का रास्ता' को कहा। शायद झुंझलाहट में । अब गुस्सा आना तो लाजमी है। जान ना पहचान और मै बेमतलब का स्माइल पास कर रहा था।
'ओह सॉरी!' मैंने अपनी पहली गलती को सुधारने की कोशिश की। वो आगे बढ़ गई और मै उसे देखता रहा। मै अभी भी मुस्करा रहा था।
एक बार फिर वो चली गई, लेकिन सुकून तो था कि
"कुछ पल ही सही दीदार तो हुआ,
वो मोहब्बत ही क्या जिसमें ये हाल ना हुआ।"
हालांकि मैंने उसका पीछा किया, घाट पर, नुक्कड़ की गोलगप्पे की दुकान पर, बुढ़िया दादी के फूल माला के पास, चाय की चुस्की लेते वक्त। उसे समझना थोड़ा मुश्किल था। अकेले ही बनारस की गलियां घूम रही थी। इससे ये जाहिर था कि बनारस से उन्हें भी उतना ही प्यार था जितना कि आम बनारसी को है।
मैं अब सोशल मीडिया से उनका पता लेता और फिर पहुंच जाता, दीदार करने, छुप छुप के ही सही देख तो लेता था।
मुझे पता था ये गलत है फिर भी उसे देखने की ललक मे खींचा चला जाता था।
ना जाने कितनी रातें चांद से बतियाने में और उनके चर्चे करने में गुजर गए। मै तो इतने से खुश था। हां इतने दिन में उसकी आदतें जरूर जान गया था। कितनी खुश रहती है, और एक खास बात थी अकेले ही । कोई तो वजह होगी. शायद! हंसती थी तो भी आंखो में कुछ खलिश तो थी।
हां मैंने अभी तक उसे फ्रेंड रिक्वेस्ट नहीं भेजी थी। थोड़ा अटिट्यूड तो था ही ।
एक दिन मै निकलते निकलते देर हो गया, मै बड़बड़ाते हुए घाट पर पहुंचा। तभी मै किसी से टकराया। मै वहीं गिर गया गिरने का दूसरा अनुभव था।
मै उठा, कुछ लोग मुझे घेरे हुए थे और कुछ लोग उसे उठा रहे थे। वो एक लड़की थी| मई बहुत शर्मिंदा हो गया था | जल्दीबाज़ी में ये कौन सी आफत में फस गया था | लड़का टकराया होता तो सॉरी से काम चल सकता था लेकिन अब तो कुछ ज्यादा ही भीड़ हो गयी थी |
'मोबाइल में घुसे रहते हैं, देख कर नहीं चलते बदतमीज लोग ' किसी महिला ने कहा।
मै उस लड़की को देखने की कोशिश कर रहा था, "अंतिमा!" अनानायास ही मेरे मुंह से उसका नाम निकल पड़ा।
वो भी चौंक पड़ी थी, आश्चर्य से घूर रही थी, शायद पहचानने की कोशिश कर रही थी। मै सकपका गया था। मै डर भी रहा था, उसका टूटा चश्मा, बिखरे बाल कुछ अनहोनी की आशंका जता रहे था। वो मेरे सामने आयी, "तुम वहीं हो ना हो पिछले कुछ महीने से मेरा पीछा कर रहे हो?"
मै चौंक गया। इतने में किसी ने कोलर पकड़ लिया था।
'पीछा करता है लड़कियों का! रुक पुलिस को फोन करते हैं।'
मै बेबस आंखो से अंतिमा को देख रहा था। वो गुस्से में भी थी।
ये तो होना ही था, आज नहीं तो कल! लेकिन। अब आगे क्या होगा? बने रहिये आखिरी भाग के लिये..
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