"इन्तेहा हो गयी इंतजार की"
‘लो भाई हो गया अब तो...’ मैंने मन ही मन कहा।
'मंदिर जा रहा हूं' मैंने जवाब दिया। अप्रत्याशित जवाब होगा किसी भी मां के लिए। शायद वो ना सोच ले की कहीं शादी तो नहीं करके आएगा। खैर मै निकल पड़ा, प्रेम के महापर्व पर शहर बनारस की खाक छानने | आज तो शहर आशिकी से पटा था।
"कौन कहता है यहां नफरत ए आम है
इधर देखो इश्क़ की बयार है हर तरफ।"
सुबह 8 बजे से शाम 4 बजे तक घाट, मंदिर और गलियों की धूल फ़ाकने के बाद भी नतीजा सिफर रहा।
"ये इंतजार का सफर बड़ा बेचैन करता है,
तड़पन में कभी आंखे जार जार करता है।"
ये वाकई चौंका देने वाला था कि लड़कियां हर छोटी छोटी चीज़े भी साझा करती है, इस लड़की का कोई जिक्र ही नहीं था। मै बेमन से तस्वीरें देख रहा था, की मेरी नजर एक तस्वीर पर थम गयी।
नौका विहार की बहुत ही सुन्दर फोटो, सूर्यास्त के समय की। मैंने उत्सुकतावश उसकी प्रोफ़ाइल खोली। 'अन्तिमा शर्मा' मुझे अनंत मिल चुका था, "प्रथम" के जीवन की अनुभूति । मेरे आंखों से मेरा प्रेम उछल रहा था, आज नयन नीर अनजाने में ही अविरल प्रवाह से बह रहे थे।
'अंतिमा' मैंने हजारों बार नाम दोहराया होगा, उसकी चंद तस्वीरें जो अब भी मेरे सामने थी मुझे अलौकिक सुख दे रही थी।
उसकी प्रोफ़ाइल से ही पता चला कि आज वो घाट पर जा रही है। मेरे लिए ये मौका था एक बार फिर देखने का और बिना समय गवाएं और बिना सोचे मै पहुंच गया।
एक घंटे का इंतज़ार, जैसे सदियाँ लग गयी हो लेकिन जब 'अन्तिमा' की झलक मिली, तो जन्नत का एहसास हुआ | वहीं मासूमियत काली बिंदी, कैट आई चश्मा, पिंक लिपस्टिक और एक बार फिर से प्यार हो गया था और हां मैंने गौर किया था की सफेद टीशर्ट और ब्लू जीन्स में थी। कुछ पल बाद ही ऐसा लग रहा था कि वो मेरे करीब आ रही थी, बिल्कुल करीब और कुछ देर बाद मेरे सामने, ठीक सामने । आई टू आई... कहीं ये सपना तो नहीं? मैंने अपना चश्मा उतारा | वो बिलकुल सामने ही थी | मैं मंत्रमुग्ध हो उसे ही देख रहा था | उसके होंठ चल रहे थे शायद कुछ कह रही थी लेकिन मैं तो उसी में खोया, सब कुछ भूल चूका था |
नाम तो पता चल गया होगा, और इनकी फेस टू फेस मुलाक़ात भी हो गई। तो आगे क्या होगा? क्या आगे भी बात बढ़ेगी? सब कुछ पता चलेगा थोड़ा सब्र रखिए और हां पसंद आए तो कॉमेंट करे और बहुत ज्यादा पसंद आए तो शेयर भी कर दें|
मिलते है फिर...

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें