नया नजरिया, नयी सोच

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शनिवार, फ़रवरी 17

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सृष्टि ठाकुर , एक नाम अंग्रेजी से एम.ए. कर रही छात्रा का ...... जिनकी कविताओं में आपको अलग ही मिजाज , अलग ही झलक मिलती है।

सृष्टि ने बताया की वो कवितायें सिर्फ मन की बेचैनी को मन के बाहर लाने के लिए लिखती हैं हाँ मगर उनमे ये काबिलियत है की उनकी कवितायें युवाओं के मन रुपी वीणा के तारों को छेड़कर एक नई धुन को जन्म देतीं है।
अब बात करें उनकी आज की कविता "डेट योरसेल्फ" की तो उसमें कितनी खूबसूरती के साथ उन्होंने बताया है की अगर आपके साथ कोई डेट पर जाने को नहीं है तो आप स्वयं के साथ डेट पर जाइये , कुछ ख़ास समय खुद के लिए निकालिये और स्वयं से प्रेम कर के देखिये।

सुमित -: गुड इवनिंग , मैं सुमित , क्रिएटिव कलर्स से
सृष्टि -:  गुड इवनिंग , मैं सृष्टि ठाकुर हूँ।

सुमित -: सृष्टि ठाकुर , wow  नाम तो बहुत अच्छा है आपका
सृष्टि -: जी , शुक्रिया |

सुमित -: आप अपने बारे में कुछ बतायेंगी ?

सृष्टि -: जी , मैं अभी अंग्रेजी से परास्नातक कर रही हूँ ।

सुमित -: ओह हो , तो यही है आपकी अंग्रेजी में लिखी हुई कविताओं का राज ...!!!!

वैसे आपके लेखन की शुरुआत कब हुई ?


सृष्टि -: जी मैं कब और क्यों लिखना शुरू किया इस बारे में तो मुझे याद नहीं है पर हाँ मेरे लिखने का कोई निश्चित समय नहीं होता है जब मेरे मन में भावों का अतिरेक होने लगता है तो मैं उन्हें कागज़ पर उतार देती हूँ और एक नई कविता अवतरित हो जाती है।

सुमित -: अच्छा आप अपनी आज की कविता "डेट योरसेल्फ" के बारे में क्या कहना चाहेंगी ?

सृष्टि -: ये कविता मैंने उन लोगों के लिए लिखी थी जिनके पास डेट करने के लिए कोई पार्टनर नहीं है , इस कविता में मैंने ये बताने की कोशिश की है की किसी अच्छे पार्टनर को डेट के लिए इन्तजार करने की बजाय हमें स्वयं के लिए भी थोडा समय निकालना चाहिए ताकि हम स्वयं को और भली भाँति से जान सकें और अपने मन की इच्छाओं की भी पूर्ति कर सकें।

सुमित -: चलिए , बहुत - बहुत शुक्रिया , हम अगली बार आपसे एक नई और खूबसूरत कविता सुनने के इन्तजार में विदा लेते हैं।

सृष्टि -: जी , शुक्रिया , अलविदा।

धन्यवाद।

सुमित सोनी के साथ युवा साहित्यकारों से बात चित का सिलसिला जारी है 

बुधवार, फ़रवरी 14

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तीन शब्द , हाँ मात्र तीन शब्दों का एक सवाल जो शायद हजारों सच्चे सवालों को भी जन्म दे रहा है , पूछा गया है जो हमें आइना दिखाने को , हमारी सच्चाई बताने को काफी है । जी हाँ , जब आप सुनेंगे लॉ स्टूडेंट पूजा दास की पहली किन्तु बहुत ही प्रभावी हिंदी कविता "मेरी रूह" को तो आप को भी वो तीन शब्दों वाला प्रश्न झकझोर कर रख देगा।
पूजा दास कविता पाठ के समय 
"पता है कौन हूँ मैं?
हाँ! वही रूह हूँ मैं
जिसकी रूह मे उन लड़कियों की रूह बसती है जिसे आपने कभी "रेप विक्टिम" करार दिया...
मैं वही रूह हूँ जिसे कुछ हवस के दरिंदो ने ज़ार ज़ार कर दिया ,
कभी आँखों से कभी बातों से ,कपड़ों के चिथड़े तो खैर बाद की बात है...."

प्रश्न है - आखिर कब तक ?
आखिर कब तक यूँ ही बच्चीयों ,लड़कियों , महिलाओं की आबरू लुटती रहेगी , कब तक कुत्सित सोच वाले पुरुषों की नजरें , नारियों की वेदना का पर्याय बनती रहेंगी ?
आखिर कब तक ? कब तक निर्भया और जैनब जैसी बच्चियाँ हैवानों की हैवानियत का शिकार होती रहेंगीं ..... आखिर कब तक ?
सीधे - सीधे शब्दों में कहूँ तो लेखिका यानि की मिस पूजा दास ने हिंदी की अपनी पहली कविता में ही विराट कोहली जैसी विस्फोटक पारी खेली और साथ में ये भी साबित कर दिया की उनमें उत्तम प्रतिभा छिपी हुई है , साथ ही साथ मैं पूजा को इस बात की भी बधाई देना चाहूँगा की उन्होंने इस कविता को लिखते समय जो प्रतिबद्धतायें तय की थी वो लगभग पूरी होती दिख रही है।
मैं ईश्वर से आपके सफल एवम् श्रेष्ठ साहित्यिक जीवन की कामना करता हूँ।
चलते चलते कुछ पंक्तिया प्रिया दास की "मेरी रूह" से
मैं उन सभी लड़कियों की रूह हूं जिनको शाम कभी सुहानी नही लगी बल्कि दर्द का, बदनामी का एक साया लगा..
मैं वही रूह हूं जिसके जिस्म का वो एक हिस्सा,ख़ौफ़ का सबब बन गयी..
सुमित सोनी के साथ युवा साहित्यकारों के साथ बातों का सफ़र जारी रहेगा |